"तुम" तुम पर आकर अटक गयी हूँ, रुक गयी हूँ, परेशान हूँ, बेचैन हूँ। वही इंटेंसिटी, वही जुनून, वही पागलपन। प्रेम का अर्थ है मेरे लिए समर्पण और समर्पण उस हद तक जहां समर्पण और जुनून में अंतर नहीं रह जाता। और जब भी प्रेम होगा मुझे वह जुनूनी समर्पण ही होगा। प्रेम अपने चक्र पर चलेगा, आकर्षण, अति आकर्षण, लगाव, समर्पण, अवसाद, पुनर्जीवन। इस चक्र पर पुनः? किसी कोरे कागज़ पर लिखना जितना आसान होता है उससे कहीं ज़्यादा कठिन लिखे हुए कागज़ पर लिखना होगा। एक बार प्रेम चक्र से गुज़र कर वापस प्रेम मृत्यु की तैयारी? क्या सचमुच कोई तैयारी की जा सकती है? प्रेम हो रहा है। आकर्षण अब अति आकर्षण में परिवर्तित हो चुका है। लगाव प्रतिक्षण बढ़ ही रहा है। इंटेंसिटी बढ़ रही है, समर्पण के लिए अब तैयार हुँ।
परंतु क्या तुम तैयार हो समर्पण के लिए? क्या तुममें ताकत है? मुझ तक पहुंचने का रास्ता जानते हो? मुझे जानते हो?
मैं ज़हर हूँ, दवा हूँ अगर तो काला, कड़वा, काढ़ा हूँ। नसों में बिधकर दर्द से दर्द को काटने वाली दवा। मैं उम्र भर दुखूंगी। अपनी आख़िरी सांस तक टीसती रहूंगी मुझसे प्यार करने वालों को। सालती रहूंगी, चुभती रहूंगी। तुम्हे पूर्ण तैयारी से आना होगा खुद को होम करने। मुझे प्यार करने का साहस बटोरना होगा, अपनी सारी शक्ति बटोर कर दर्द सहने की क्षमता विकसित करनी होगी। मेरे अंदर, मेरे बाहर सब तरफ सिर्फ दर्द है, इसे अपनाए बिना तुम मुझ तक नहीं पहुँच पाओगे।
प्रेम के हिस्से सिर्फ खुशी के पल, हँसना, खुशी महसूसना नहीं होता। प्रेम में अवसाद का भी बराबर का हिस्सा होता है, टीस भी आवश्यक होती है। एक दूसरे को प्रेमानुभूति कराने के साथ ही एक दूसरे को रुलाने की कला का आना भी ज़रूरी है, जो सिर्फ़ खुशी की ही बातें करते हैं, वे झूठे होते हैं या अनजान होते हैं, उन्हें भान नहीं होता प्रेम के पूर्ण रूप का। तो यदि तुममें ताकत है मुझ तक पहुंचने की और यदि तुम समझते हो प्रेम के पूर्ण रूप को, तो जब मैं कहूँ मुझे प्रेम है तुमसे तो उसका उत्तर "मुझे भी " दे सकते हो तुम।