शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

तुम


वो आख़िरी मुलाकात थी हमारी। उसने मुझे गले लगाने से इन्कार कर दिया था और बस मुस्कुरा कर चला गया।
मैं उसे दूर तक जाता देखती रही, उसकी जल्द वापसी की उम्मीद के साथ....... दूर जाते- जाते वो दिखना बंद हो गया।
उसका दिखना जितना धुंधला होता जा रहा था, यादें उतनी गाढ़ी हो रही थीं। मैं लिखने लगी, कुछ कविता जैसा........ पहली ही बार लिखा था मैंने........पहली ही बार कुछ चुभा था दिल में......

फिर, बहुत- बहुत दिन बीत जाने के बाद एक दिन अचानक उसका फ़ोन आया,
-कौन? मैंने जानकर अनजान बनने का नाकाम नाटक किया।

-तुम्हारे घर के नीचे खड़ा हूँ, उसने कहा।

-मैंने घर बदल दिया है

-तो अपने पुराने पते पर आ जाओ जल्दी, कहकर उसने फ़ोन काट दिया.......

  मैं भागी- भागी वहां पहुंच गई......

वो ठीक उसी जगह खड़ा था, जहाँ हमने पहली बार एक दूसरे का हाथ पकड़ा था।
उसने बाहें फैलाईं और मैं दौड़कर उससे लिपट गयी।
मैं घण्टो उसके गले लगी रही और सारी व्यथाएँ आंखों से झरती रहीं।

सोमवार, 5 नवंबर 2018

कहानियाँ

जब हम किसी को जानते नहीं, किसी प्रकार की कोई जान पहचान नहीं होती, तो वो कितना सामान्य व्यक्ति लगता है, और जैसे ही हम उसे जान लेते हैं तो वह असामान्य हो जाता है। वह साधारण, अति साधारण, विशिष्ट या फिर अति विशिष्ट हो जाता है। जो हमारे लिए अभी तक अजनबी था वो अचानक ही अति विशिष्ट हो जाता है। इस अनजाने से विशिष्ट तक के बीच के सफ़र को ही कहानी कहते हैं। हर चेहरे के पीछे कोई न कोई कहानी होती है, उस कहानी को जान लेने के बाद वो व्यक्ति अनजाना नहीं रह जाता, उसकी एक पहचान हो जाती है हमारे पास, क्यूंकि अब उसकी कहानी है हमारे पास। कितनी अनकही, अनसुनी कहानियां होती हैं हमारे चारों ओर, कितनी ही हम सुन चुके होते हैं, कभी-कभी कोई कहानी किसी अन्य कहानी से मिलती जुलती प्रतीत होती है तो कभी कोई कहानी हमें हतप्रभ कर देती है, कभी कोई कहानी देर तक दिमागी उलझन बनी रहती है तो कभी कोई दिल को छू लेने वाली होती है। सारी कहानियों में जो एक बात सबमें होती है वो ये कि सारी कहानियां अविस्मरणीय होती हैं, एक व्यक्ति को जान लेने के बाद वो अनजान नहीं हो सकता, उसे देखते ही हमें उसकी कहानी याद हो आती है। चारो तरफ बिखरे लोग, चारो तरफ बिखरी कहानियाँ…….

रविवार, 28 अक्टूबर 2018

मुक्ति

तुम्हें जाना था, तो कहकर भी तो जा सकते थे? बस एक अलविदा की ही तो चाह थी। ऐसा कुछ ज़्यादा तो नहीं चाहा था? मैंने तो खुद रास्ता बना दिया था, तैयारी कर दी थी तुम्हारे जाने की, तुमसे अलविदा भी क्यूँ न कहा गया? अलविदा न कहकर जाने वालों का इंतज़ार रह जाता है हमेशा..... और इंतज़ार से बढ़कर भी सज़ा क्या हो सकती है भला? इंतज़ार सालता रहता है हर पल....... हम घुलते रहते हैं तुम्हारे इंतज़ार में कि बस एक दिन लौट आओगे और सीने से लगा लोगे हमें कसकर और उस एक पल में सारी यातनायें, सारे कष्ट मिट्टी हो जाएंगे। इंतज़ार की अंधेरी घड़ी में बस तुम्हारे आने की दुआ जिलाये रखती है। सुनो! लौट कर आना ज़रूर एक बार, बस अलविदा कहने...... और कहना बस यही एक आखिरी मुलाकात है, और ये आख़िरी अलविदा, कि अब नहीं करना होगा तुम्हें इंतज़ार, जाओ मुक्त हो जाओ।

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018

यात्रा

किसी किताब के पूरा होने पर रीता हुआ सा महसूस होता है। किताब को पढ़ते हुए हम कई दिनों तक, कई बार महीनों भी यात्रा पर रहते हैं। कई बार हम एक साथ कई किताबें पढ़ रहे होते हैं, लेकिन उनमें कोई एक किताब प्राथमिकता होती है, जिस यात्रा को हम सर्वप्रथम पूरा करना चाहते हैं। यात्रा पूरी होने पर हम कुछ अलग अनुभव करते हैं, कुछ एकदम ही नया, इतना नया कि प्रथम ही प्रतीत होता है हर बार।
मैं हमेशा कोई उपन्यास या कहानी संग्रह पूरा होने पर, कम से कम दो दिन कविताएं पढ़ती हूँ, यह किसी फिल्म के दौरान एक गाने जैसा होता है।
किताबों का संसार अनोखा है और मैं इसकी नौसिखिया यात्री, पर अपने इस जीवन में मैं इस संसार के जितने हो सके शहर, गाँव, कस्बे इत्यादि घूम लेना चाहती हूँ, जितने हो सके रास्तों से गुजरते हुए उन्हें अपनी स्मृति में संजो लेना चाहती हूँ।❤️

गुरुवार, 30 अगस्त 2018

अभिव्यक्ति

तुम्हारा मिलना, जैसे स्याह रात बारिश के बाद धूप खिलना।

गर्म हथेलियाँ तुम्हारी धीरे से पकड़ना और रख देना कांधे पे सर, जैसे गर्माहट का सब गीले को सहलाना।

हाथ थामे बैठना, मुस्कुराना बेवजह, अंतर तक तुम्हारे शब्द महसूसना, जैसे किरणों से नदी के पानी का सुनहला होना।

समय का बीतते जाना, सांसो का घुलते जाना, ज़िद मेरी तुम्हें थोड़ी और देर रोकना, जैसे तूफान के बाद पक्षियों का कोटर से बाहर आना।

पिछली से अबकी मुलाकात के बीच का सब कहना बताना, जैसे धुले हुए पत्तों का चमकना।

तुम्हें देखना, बस देखते जाना, और अगली मुलाकात के लिए पूछना, जैसे छुटपुट बादलों का आकाश में नज़र आना।

बीते वक़्त को याद करना, तुम्हारी यादों में सुख महसूसना, जैसे बारिश का हर छोटे बड़े गड्ढे को भर देना।

गुरुवार, 26 जुलाई 2018

जीवन उत्सव

मैं बहुत खुश हूँ ज़िन्दगी से। ऐसा लगता है मुझे और कुछ नहीं चाहिए। सचमुच बहुत खुश हूँ। मैं जैसे चाहती थी, ठीक वैसे ही अपनी ज़िन्दगी जी रही हूँ। जैसी कल्पना की थी, हूबहू  वैसी ही। अकेलेपन का उत्सव मनाते हुए, अपना ख़याल खुद रखते हुए, अपने घर को, अपने पसन्दीदा रंगों से, अपने लिए सजाते हुए। और ईश्वर बहुत दयालु हैं। इतने के बाद रोज़ एक खूबसूरत तोहफ़ा देते हैं मुझे। रोज़ ही, जैसे नींद खुलते ही बारिश, जैसे तुम्हारा होना मेरे ख्यालों में। सबकुछ कितना खूबसूरत है। मुझे कोई शिकायत नहीं है किसी से, मैंने सबको माफ़ कर दिया है, जिसने भी कभी मेरा दिल दुखाया है। मैं अब खुश हूँ, इतनी कि बाँट सकती हूँ खुशियाँ। अपने उत्सव में शामिल कर सकती हूँ हर किसी को जो प्यार करता है मुझसे। और तुम? तुम्हारी जगह हमेशा ख़ास रहेगी। सिर्फ़ आख़िरी नहीं, मेरी किताब के हर पन्ने पर तुम्हारा नाम होगा।

मंगलवार, 26 जून 2018

प्रेम-सम्बन्ध

मुझे प्यार करने की हैसियत है तुम्हारी? कर पाओगे वैसा प्यार, जैसा मुझे है अपने आप से
या तुमसे।  वो प्यार जिसमे समर्पण और जुनून में कोई अंतर नहीं है, जहाँ समर्पण कोमल नहीं जूनून की तरह उत्तेजक भाव है। क्या करते हो खुद से प्रेम? क्यूँकि जब खुद प्रेम से परिपूर्ण होगे तभी दे सकोगे किसी को प्रेम।
मुझे प्रेम करने की एकमात्र शर्त प्रेम है। पहली और आखिरी शर्त। असीमित प्रेम, ब्रह्माण्ड की किसी भी और चीज़ के पहले और बाद मैं हूँ तुम्हारे लिए, दे पाओगे ये एहसास?
हाँ! कह सकते हो मुझे स्वार्थी, मांग है ये मेरी तुमसे, कहा है तुमने क्यूँकि कि तुम्हे प्रेम है मुझसे। प्रेम की उस पराकाष्ठा तक पहुँच पाओगे जहाँ एकाकार महसूसा जा सकता है। जहाँ अपने और मुझमे कोई अंतर न कर पाओ तुम, शरीर का होना न होना जहाँ महत्वपूर्ण नहीं रह जाता कि जब अपना हाथ चूमो तुम तो एहसास मुझ तक पहुंचे, अपने हाथ अपने गालों पे रखो तो मुझे तुम्हारा स्पर्श महसूस हो। दे पाओगे ये एहसास? जूनून की इंटेसिटी से कर पाओगे समर्पण? यदि हाँ, तो ही कहना की प्रेम करते हो मुझसे, क्यूँकि प्रेम हमेशा एकतरफा होता है और मैं अपने प्रेम में पूर्ण हूँ। याद रखो प्रेम का एक चरण अवसाद भी है, उसे जिए बिना प्रेम पूर्ण नहीं होता, तो यदि अवसाद जीने की और एहसास देने की क्षमता है तो इस प्रेम को सम्बन्ध का रूप देने की शुरुआत की जा सकती है।

सोमवार, 21 मई 2018

चाँद लड़की , इश्क़ मौसम

चाँद लड़की इश्क़ मौसम खोजती थी। कुछ ओसभीनी, नशीली रातों में। और ढूंढते, ढूंढते वो मौसम के पार चली आती, तब याद आते उसे सब, वो जादू जैसा मौसम, जिसमें सफेद चादर तले मोती चमकते थे, जुगनू उड़ते थे। मोती और जुगनू की मिली जुली चमक से उसकी आंखें चुंधिया जाती थीं। वो इश्क़ खोजती थी और दर्द बटोरती जाती थी। सर्दियों के मोतियों को अपनी आंखों में करीने से सजा लिया था उसने, कि जब भी इश्क़ मौसम याद आता बस आंखों से मोती झरने लगते थे।
"सुख" मोतियों के झरने में, मौसम के खोजने में, हर तरफ सुख था, जो दुख के मैले कंबल में लिपटा हुआ था। दुःख का कंबल बहुत मोटा था, मगर सुख को बचाये रखने के लिए यह मोटाई ज़रूरी थी।

रविवार, 6 मई 2018

प्रेम

और फिर? फिर तुम्हें मरना होगा। उनके लिए, उनके समाज के लिए, उनके रिवाजों के लिए। हाँ!! ज़रूरी है मरना। मरना शरीर का नहीं, जिसमे अंग काम करना बंद कर देते हैं। मरना, जिसमें आत्मा छलनी होती जाती है, वो मरना एक बार का नहीं होता, बार-बार मरना होता है। कई बार, जब- जब तुम्हें किसी से प्रेम होगा, उसे साबित करने के लिए मरना होगा। महत्व प्रेम करने का नहीं है, साबित करने का है। तरीका एक ही है, मृत्यु। छलनी कर दो आत्मा को अपनी, प्रेम यही बलिदान मांगता है। यदि शरीर को खत्म किया तो प्रेम में असफल हो तुम, तुम्हें आत्मा को छलनी करना होगा, प्रेम को अपने रक्त की अंतिम बूंद तक से सींचना होगा। अपने मांस से प्रेम की क्षुधा शांत करनी होगी। प्रेम करना आसान है, वो तो प्रकृति है जीव की। पर यदि तुम मनुष्य हो तो साबित करना होगा तुम्हे अपने प्रेम को। कितना? हाँ!! कितना प्रेम करते हो का उत्तर देना होगा। उतना ही गहरा अपनी आत्मा को खोदना होगा तुम्हें। यदि जन्म से ही प्रेम कर रहे हो तो उस गहराई तक जाकर खोदना होगा, पेट में नौ माह रखा गया है तुम्हें, मत भूलना और गहरा, और गहरा, और गहरा खोदना होगा। इतना गहरा कि शरीर रूपी पर्दे के पार से भी घाव  दिखाई दे। और तुम्हारी छिली हुई आत्मा पर  यदा कदा उठने वाली आंधी से धूल मिट्टी पड़ती रहे, और टीस उठती रहे और प्रेम साबित होता रहे।

शनिवार, 31 मार्च 2018

तुम, मैं और प्रेम......

"तुम" तुम पर आकर अटक गयी हूँ, रुक गयी हूँ, परेशान हूँ, बेचैन हूँ। वही इंटेंसिटी, वही जुनून, वही पागलपन। प्रेम का अर्थ है मेरे लिए समर्पण और समर्पण उस हद तक जहां समर्पण और जुनून में अंतर नहीं रह जाता। और जब भी प्रेम होगा मुझे वह जुनूनी समर्पण ही होगा। प्रेम अपने चक्र पर चलेगा, आकर्षण, अति आकर्षण, लगाव, समर्पण, अवसाद, पुनर्जीवन। इस चक्र पर पुनः? किसी कोरे कागज़ पर लिखना जितना आसान होता है उससे कहीं ज़्यादा कठिन लिखे हुए कागज़ पर लिखना होगा। एक बार प्रेम चक्र से गुज़र कर वापस प्रेम मृत्यु की तैयारी? क्या सचमुच कोई तैयारी की जा सकती है? प्रेम हो रहा है। आकर्षण अब अति आकर्षण में परिवर्तित हो चुका है। लगाव प्रतिक्षण बढ़ ही रहा है। इंटेंसिटी बढ़ रही है, समर्पण के लिए अब तैयार हुँ।
परंतु क्या तुम तैयार हो समर्पण के लिए? क्या तुममें ताकत है? मुझ तक पहुंचने का रास्ता जानते हो? मुझे जानते हो?

मैं ज़हर हूँ, दवा हूँ अगर तो काला, कड़वा, काढ़ा हूँ। नसों में बिधकर दर्द से दर्द को काटने वाली दवा। मैं उम्र भर दुखूंगी। अपनी आख़िरी सांस तक टीसती रहूंगी मुझसे प्यार करने वालों को। सालती रहूंगी, चुभती रहूंगी। तुम्हे पूर्ण तैयारी से आना होगा खुद को होम करने। मुझे प्यार करने का साहस बटोरना होगा, अपनी सारी शक्ति बटोर कर दर्द सहने की क्षमता विकसित करनी होगी। मेरे अंदर, मेरे बाहर सब तरफ सिर्फ दर्द है, इसे अपनाए बिना तुम मुझ तक नहीं पहुँच पाओगे।

प्रेम के हिस्से सिर्फ खुशी के पल, हँसना, खुशी महसूसना नहीं होता। प्रेम में अवसाद का भी बराबर का हिस्सा होता है, टीस भी आवश्यक होती है। एक दूसरे को प्रेमानुभूति कराने के साथ ही एक दूसरे को रुलाने की कला का आना भी ज़रूरी है, जो सिर्फ़ खुशी की ही बातें करते हैं, वे झूठे होते हैं या अनजान होते हैं, उन्हें भान नहीं होता प्रेम के पूर्ण रूप का। तो यदि तुममें ताकत है मुझ तक पहुंचने की और यदि तुम समझते हो प्रेम के पूर्ण रूप को, तो जब मैं कहूँ मुझे प्रेम है तुमसे तो उसका उत्तर "मुझे भी " दे सकते हो तुम।

कल्पना और यथार्थ के बीच

तुम्हारे इंतज़ार में मंडी हाउस की सड़कों पर घंटो घूमती रहती हूं, ये जानते हुए कि मैं कहाँ हूँ, इसका तुम्हें तो अंदाज़ा भी नहीं है या शायद है, केवल अंदाज़ा। और इस कल्पना में कि शायद इस अंदाज़े से तुम कभी मुझे ढूंढते हुए यहाँ तक आ जाओगे, आ जाओगे अचानक मेरे बगल तक और कंधे पर हाथ रखकर चौंका दोगे मुझे। फिर हम एक दूसरे का हाथ पकड़े घंटो घूमते रहेंगे इन्हीं सड़कों पर साथ-साथ। यह कल्पना है मेरी, एक बहुत सुंदर कल्पना। जब तक कल्पना है, अंतहीन है, सुखद है, कि जब यथार्थ हो जाएगा क्षणिक हो जाएगा। कुछ समय तक वर्तमान होकर अतीत हो जाएगा। मगर जब तक कल्पना है मैं इसे जीती जाऊंगी, प्रतिक्षण, सतत इसके यथार्थ होने तक या अगर यथार्थ न हुआ तो अनंत तक। क्या मैं सचमुच इसे यथार्थ होते देखना चाहती हूँ? क्या मैं सचमुच इसे खो देना चाहती हूँ? कहते हैं कि  सुख बहुत छोटा होता है, आता नहीं कि चला जाता है। क्षणिक होता है न सुख? पर क्या इस एक क्षण की कल्पना बहुत लंबी हो सकती है? कल्पना में भी तो सुख होता है या सुखी होने का भृम? लम्बा भृम। क्या तुम उस दिन सचमुच मुझसे मिलने आये थे या वो मेरी कल्पना थी? पूरी रात तुम्हारे साथ तुम्हारी बाहों में। यह सच है या कल्पना? तुम सचमुच हो या मेरी कल्पना हो? तुम एक सुंदर कल्पना हो जिसे मैं जी रही हूँ लगातार जाने कब से और जाने कब तक जियूंगी? "कब तक जियूंगी" क्या कोई समय निर्धारित किया जा सकता है? यह सब जो मैं जी रही हूँ सच है या कल्पना या मेरा पागलपन? क्या मैं पागल हो रही हूँ या मैं पुनः प्रेम में पड़ रही हूं?
आह!! मुझे पता था कि जब मैं प्रेम में पड़ूँगी, पागल हो जाऊंगी, क्या हो रहा है ये सब? मैं लिखने में भी खुद को असमर्थ पा रही हूँ, उफ़्फ़

गुरुवार, 29 मार्च 2018

तुम

सोती रहती हूँ, मगर दिमाग का एक भाग सक्रिय रहता है। वह भाग जिसमें तुम रहते हो, वह भाग जागता है और सोने नहीं देता। बार-बार नींद उचट जाती है। उठ के बैठ जाती हूँ कई बार नींद में। दिन रात चौबीसों घंटे तुम दिमाग के एक हिस्से में हो। तुम्हारे साथ बिताए वक़्त की रील हमेशा चलती रहती है, मैं उस समय से बाहर नहीं आ पाती। जब सोचते सोचते अचानक ही याद आता है यथार्थ, तब अचंभित हो उठती हूँ, परेशान हो जाती हूँ, चाहती हूं ये रील बन्द हो जाये थोड़े समय के लिए, परन्तु ऐसा होता नहीं है। सिनेमाई प्रेम में हमेशा ही दिल का महत्व देखा है, दिल ही मुख्य बिंदु रहता है हमेशा, परन्तु प्रेम के सिनेमा में दिमाग से परेशान हूँ। इसका सम्बन्ध मेरी समझ से परे है परंतु सच यही है कि तुम दिमाग के एक हिस्से में घर कर गए हो जहाँ हमेशा ही तुम्हारे साथ दिखती रहती हूँ मैं, वे दृश्य हमेशा ही चल रहे होते हैं जब मैं तुम्हारे साथ बैठी थी कभी और तुम्हारा हाथ पकड़ा था और वो जब बातों -बातों में तुमने मेरा हाथ थोड़ा सा दबा दिया था, कुछ अलग सा महसूस हुआ था मुझे, और जितनी बार वो याद आता है कुछ अलग महसूसती हूँ, एक गहरी मुस्कान आ जाती है चेहरे पर, यदा-कदा हँसने ही लगती हूँ, चाहे एकदम अकेले हूँ या फिर भीड़ में भी, दफ़्तर में काम करते हुए या घर पर खाना बनाते हुए भी, और जिस जगह पे भी होती हूँ जिस भी दैनिक कार्य से गुज़र रही होती हूँ, तुमसे जुड़ी कोई न कोई बात उस घटना में होती है, एक रील हर घटना के लिए है।
उफ़्फ़!! क्या हुआ है दिमाग में? क्या रोल है इसमें दिल का? क्या  हो गया है मुझे?

सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

तुम्हारी ओर......

मुझे तुमसे प्यार नहीं करना चाहिए, क्यूँकि प्यार करने से उखड़ने लगती हैं सांसे, बिखरने लगता है जीवन।
मुझे तुमसे प्यार नहीं करना चाहिए क्यूँकि ये जीवन की सबसे खूबसूरत और सबसे कमज़ोर घड़ी होती है, एक पल जहां सब अच्छा होता है और अगले ही पल बर्बाद हो जाता है सबकुछ और दर्द के गहरे सागर में डूबने उतराने लगते हैं हम। मुझे तुमसे प्यार नहीं करना चाहिए क्यूँकि जो चीज़ सबसे ज़्यादा खुशी देती है एक निश्चित समय के बाद वही सबसे ज़्यादा दुख देती है ये नियम है संसार का। मुझे तुमसे प्यार नहीं करना चाहिए क्यूँकि प्यार की नदी अंततः अवसाद के सागर में जाकर मिलती है। पर क्या मैं रोक पाउंगी खुद को तुमसे प्यार करने से इतनी समस्याओं के बाद? क्या मैं समझा पाउंगी खुद को कि ये जो हो रहा है इसे यहीं इसी क्षण रोक देना कितना ज़रूरी है? ज़रूरी है कि मैं खुद को बचाये रखूं, बचाये रखूं उन तूफानों से जिनका परिणाम मुझे पहले से पता है, बचाये रखूं उन चोटों से जिनकी टीस जीवन पर्यंत रह जानी है, बचाये रखूं खुद को अवसाद के समंदर की गहराई में जाने से। नहीं, मैं खुद को नहीं रोक सकती, मैं खुद को खुद ही धकेल रही हूं तुम्हारी ओर, कि जितनी बार तुम्हें देखती हूँ, सुनती हूँ तुम्हारे शब्द या तुम्हारे मुँह से अपना नाम उतने ही कदम इस भयावह, वीभत्स संसार की ओर बढ़ा लेती हूं अनायास ही। क्या ये कोई नशा है, जिसका नकारात्मक परिणाम जानते हुए भी उसे किये जा रही हूं? या उससे भी कुछ ज़्यादा? मृत्यु जैसा कि जिसकी तरफ प्रतिपल बढ़ तो रही हूं परन्तु एक दिन सबकुछ खत्म हो जाने के डर से अनजान, खुद के खाख हो जाने से अनजान। परन्तु मृत्यु फिर भी सुखद है, क्यूंकि तब सबकुछ ही ख़त्म हो जाना है, सबकुछ ही खाख हो जाना है, प्यार की स्थिति कहीं ज़्यादा भयावह है। शायद इसलिए कि जब कोई मरता है तो मरने वाले से जुड़े लोग उसके चले जाने का , खुद के पास न होने का दुख महसूसते हैं। प्यार में इंसान खुद के खुद से अलग हो जाने की पीड़ा खुद ही महसूसता है। इसलिए मुझे रोक लेना चाहिए खुद को लेकिन मैं सबकुछ जानते हुए भी रोक नहीं पाउंगी।

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

जाने-अनजाने

रोज़ हमे बहुत से अनजाने लोग मिलते हैं। कई बार उनसे बातें भी होती हैं। अनजानी बातें। अनजाने लोगों से अनजानी बातें, जाने हुए लोगों से जानी पहचानी बातें। कई बार कुछ अनजानों से पहचान भी हो जाती है, फिर उनसे जानी पहचानी बातें होती हैं। कुछ इतने अनजान कि उनसे बातें होती नहीं कभी। कभी रोड पर साथ चल रहे अनजाने कभी ट्रेन में साथ सफर कर रहे अनजाने। कुछ अनजाने लोग ऐसे भी मिलते हैं जिन्हें देखकर लगता है पहले भी देखा है। पहेली जैसे अनजाने। लोग अनजाने, रास्ते अनजाने, शहर अनजाने। कुछ भी जाना हुआ, जानने से पहले अनजाना हुआ करता है। अनजाने को जानने की जिज्ञासा होती है जान लेने पर और जानने की, और जान लेने पर और जान लेने की। कितना कौतूहल होता है जब पता चले कि हम जिस शहर में रहते हैं, वहां कई जगहें हैं, कई कोने हैं जो हमसे और जिनसे हम बिल्कुल अनजान हैं, कभी भीड़ में खड़े हुए सोचना कि यहां सब अनजाने लोग हैं। सब के सब अनजाने। छोटे गाँवों में सब लोग एक दूसरे को जानते हैं, बड़े शहरों तक पहुंचते पहुंचते अनजानापन बढ़ते जाता है। हम जहां रहते हैं, आस पास के लोगों को भी नहीं जानते। जगहों को जानते हैं। काफी जगहों पर घूमते हैं तो जगहों से जान पहचान होती जाती है पर लोगों से नहीं। लोग अनजाने होते हैं, हर बार। कई बार एक ही जगह पर बार बार जाने से जगह काफी जानी पहचानी हो जाती है पर लोग हर बार नए होते हैं। हर बार नए, हर बार उतने ही अनजाने। अनजानापन बढ़ता नहीं है। ऐसा नहीं होता कि हम एक बार किसी को देखे तो अनजान, अगली बार देखे तो और अनजान। अगली बार देखने पर वो कम अनजाना ही लगेगा। पहचान बढ़ती है। कभी धीरे-धीरे, कभी एकदम ही। कभी-कभी  हम खुद को भी अनजाने ही लगते हैं। खुद को देखते तो रोज़ हैं। बातें भी करते हैं, साथ उठते-बैठते हैं, खाना-पीना, घूमना, दिनभर का साथ, रात भर का साथ, फिर भी कई बार खुद को थोड़ा अनजाना महसूस करते हैं खुद से। खुद को शीशे में निहारते हुए महसूसते हैं , क्या ये मैं हूँ? या कौन हूँ मैं?