शनिवार, 31 मार्च 2018

कल्पना और यथार्थ के बीच

तुम्हारे इंतज़ार में मंडी हाउस की सड़कों पर घंटो घूमती रहती हूं, ये जानते हुए कि मैं कहाँ हूँ, इसका तुम्हें तो अंदाज़ा भी नहीं है या शायद है, केवल अंदाज़ा। और इस कल्पना में कि शायद इस अंदाज़े से तुम कभी मुझे ढूंढते हुए यहाँ तक आ जाओगे, आ जाओगे अचानक मेरे बगल तक और कंधे पर हाथ रखकर चौंका दोगे मुझे। फिर हम एक दूसरे का हाथ पकड़े घंटो घूमते रहेंगे इन्हीं सड़कों पर साथ-साथ। यह कल्पना है मेरी, एक बहुत सुंदर कल्पना। जब तक कल्पना है, अंतहीन है, सुखद है, कि जब यथार्थ हो जाएगा क्षणिक हो जाएगा। कुछ समय तक वर्तमान होकर अतीत हो जाएगा। मगर जब तक कल्पना है मैं इसे जीती जाऊंगी, प्रतिक्षण, सतत इसके यथार्थ होने तक या अगर यथार्थ न हुआ तो अनंत तक। क्या मैं सचमुच इसे यथार्थ होते देखना चाहती हूँ? क्या मैं सचमुच इसे खो देना चाहती हूँ? कहते हैं कि  सुख बहुत छोटा होता है, आता नहीं कि चला जाता है। क्षणिक होता है न सुख? पर क्या इस एक क्षण की कल्पना बहुत लंबी हो सकती है? कल्पना में भी तो सुख होता है या सुखी होने का भृम? लम्बा भृम। क्या तुम उस दिन सचमुच मुझसे मिलने आये थे या वो मेरी कल्पना थी? पूरी रात तुम्हारे साथ तुम्हारी बाहों में। यह सच है या कल्पना? तुम सचमुच हो या मेरी कल्पना हो? तुम एक सुंदर कल्पना हो जिसे मैं जी रही हूँ लगातार जाने कब से और जाने कब तक जियूंगी? "कब तक जियूंगी" क्या कोई समय निर्धारित किया जा सकता है? यह सब जो मैं जी रही हूँ सच है या कल्पना या मेरा पागलपन? क्या मैं पागल हो रही हूँ या मैं पुनः प्रेम में पड़ रही हूं?
आह!! मुझे पता था कि जब मैं प्रेम में पड़ूँगी, पागल हो जाऊंगी, क्या हो रहा है ये सब? मैं लिखने में भी खुद को असमर्थ पा रही हूँ, उफ़्फ़

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