रविवार, 28 अक्टूबर 2018

मुक्ति

तुम्हें जाना था, तो कहकर भी तो जा सकते थे? बस एक अलविदा की ही तो चाह थी। ऐसा कुछ ज़्यादा तो नहीं चाहा था? मैंने तो खुद रास्ता बना दिया था, तैयारी कर दी थी तुम्हारे जाने की, तुमसे अलविदा भी क्यूँ न कहा गया? अलविदा न कहकर जाने वालों का इंतज़ार रह जाता है हमेशा..... और इंतज़ार से बढ़कर भी सज़ा क्या हो सकती है भला? इंतज़ार सालता रहता है हर पल....... हम घुलते रहते हैं तुम्हारे इंतज़ार में कि बस एक दिन लौट आओगे और सीने से लगा लोगे हमें कसकर और उस एक पल में सारी यातनायें, सारे कष्ट मिट्टी हो जाएंगे। इंतज़ार की अंधेरी घड़ी में बस तुम्हारे आने की दुआ जिलाये रखती है। सुनो! लौट कर आना ज़रूर एक बार, बस अलविदा कहने...... और कहना बस यही एक आखिरी मुलाकात है, और ये आख़िरी अलविदा, कि अब नहीं करना होगा तुम्हें इंतज़ार, जाओ मुक्त हो जाओ।

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018

यात्रा

किसी किताब के पूरा होने पर रीता हुआ सा महसूस होता है। किताब को पढ़ते हुए हम कई दिनों तक, कई बार महीनों भी यात्रा पर रहते हैं। कई बार हम एक साथ कई किताबें पढ़ रहे होते हैं, लेकिन उनमें कोई एक किताब प्राथमिकता होती है, जिस यात्रा को हम सर्वप्रथम पूरा करना चाहते हैं। यात्रा पूरी होने पर हम कुछ अलग अनुभव करते हैं, कुछ एकदम ही नया, इतना नया कि प्रथम ही प्रतीत होता है हर बार।
मैं हमेशा कोई उपन्यास या कहानी संग्रह पूरा होने पर, कम से कम दो दिन कविताएं पढ़ती हूँ, यह किसी फिल्म के दौरान एक गाने जैसा होता है।
किताबों का संसार अनोखा है और मैं इसकी नौसिखिया यात्री, पर अपने इस जीवन में मैं इस संसार के जितने हो सके शहर, गाँव, कस्बे इत्यादि घूम लेना चाहती हूँ, जितने हो सके रास्तों से गुजरते हुए उन्हें अपनी स्मृति में संजो लेना चाहती हूँ।❤️