रोज़ हमे बहुत से अनजाने लोग मिलते हैं। कई बार उनसे बातें भी होती हैं। अनजानी बातें। अनजाने लोगों से अनजानी बातें, जाने हुए लोगों से जानी पहचानी बातें। कई बार कुछ अनजानों से पहचान भी हो जाती है, फिर उनसे जानी पहचानी बातें होती हैं। कुछ इतने अनजान कि उनसे बातें होती नहीं कभी। कभी रोड पर साथ चल रहे अनजाने कभी ट्रेन में साथ सफर कर रहे अनजाने। कुछ अनजाने लोग ऐसे भी मिलते हैं जिन्हें देखकर लगता है पहले भी देखा है। पहेली जैसे अनजाने। लोग अनजाने, रास्ते अनजाने, शहर अनजाने। कुछ भी जाना हुआ, जानने से पहले अनजाना हुआ करता है। अनजाने को जानने की जिज्ञासा होती है जान लेने पर और जानने की, और जान लेने पर और जान लेने की। कितना कौतूहल होता है जब पता चले कि हम जिस शहर में रहते हैं, वहां कई जगहें हैं, कई कोने हैं जो हमसे और जिनसे हम बिल्कुल अनजान हैं, कभी भीड़ में खड़े हुए सोचना कि यहां सब अनजाने लोग हैं। सब के सब अनजाने। छोटे गाँवों में सब लोग एक दूसरे को जानते हैं, बड़े शहरों तक पहुंचते पहुंचते अनजानापन बढ़ते जाता है। हम जहां रहते हैं, आस पास के लोगों को भी नहीं जानते। जगहों को जानते हैं। काफी जगहों पर घूमते हैं तो जगहों से जान पहचान होती जाती है पर लोगों से नहीं। लोग अनजाने होते हैं, हर बार। कई बार एक ही जगह पर बार बार जाने से जगह काफी जानी पहचानी हो जाती है पर लोग हर बार नए होते हैं। हर बार नए, हर बार उतने ही अनजाने। अनजानापन बढ़ता नहीं है। ऐसा नहीं होता कि हम एक बार किसी को देखे तो अनजान, अगली बार देखे तो और अनजान। अगली बार देखने पर वो कम अनजाना ही लगेगा। पहचान बढ़ती है। कभी धीरे-धीरे, कभी एकदम ही। कभी-कभी हम खुद को भी अनजाने ही लगते हैं। खुद को देखते तो रोज़ हैं। बातें भी करते हैं, साथ उठते-बैठते हैं, खाना-पीना, घूमना, दिनभर का साथ, रात भर का साथ, फिर भी कई बार खुद को थोड़ा अनजाना महसूस करते हैं खुद से। खुद को शीशे में निहारते हुए महसूसते हैं , क्या ये मैं हूँ? या कौन हूँ मैं?