मुझे तुमसे प्यार नहीं करना चाहिए, क्यूँकि प्यार करने से उखड़ने लगती हैं सांसे, बिखरने लगता है जीवन।
मुझे तुमसे प्यार नहीं करना चाहिए क्यूँकि ये जीवन की सबसे खूबसूरत और सबसे कमज़ोर घड़ी होती है, एक पल जहां सब अच्छा होता है और अगले ही पल बर्बाद हो जाता है सबकुछ और दर्द के गहरे सागर में डूबने उतराने लगते हैं हम। मुझे तुमसे प्यार नहीं करना चाहिए क्यूँकि जो चीज़ सबसे ज़्यादा खुशी देती है एक निश्चित समय के बाद वही सबसे ज़्यादा दुख देती है ये नियम है संसार का। मुझे तुमसे प्यार नहीं करना चाहिए क्यूँकि प्यार की नदी अंततः अवसाद के सागर में जाकर मिलती है। पर क्या मैं रोक पाउंगी खुद को तुमसे प्यार करने से इतनी समस्याओं के बाद? क्या मैं समझा पाउंगी खुद को कि ये जो हो रहा है इसे यहीं इसी क्षण रोक देना कितना ज़रूरी है? ज़रूरी है कि मैं खुद को बचाये रखूं, बचाये रखूं उन तूफानों से जिनका परिणाम मुझे पहले से पता है, बचाये रखूं उन चोटों से जिनकी टीस जीवन पर्यंत रह जानी है, बचाये रखूं खुद को अवसाद के समंदर की गहराई में जाने से। नहीं, मैं खुद को नहीं रोक सकती, मैं खुद को खुद ही धकेल रही हूं तुम्हारी ओर, कि जितनी बार तुम्हें देखती हूँ, सुनती हूँ तुम्हारे शब्द या तुम्हारे मुँह से अपना नाम उतने ही कदम इस भयावह, वीभत्स संसार की ओर बढ़ा लेती हूं अनायास ही। क्या ये कोई नशा है, जिसका नकारात्मक परिणाम जानते हुए भी उसे किये जा रही हूं? या उससे भी कुछ ज़्यादा? मृत्यु जैसा कि जिसकी तरफ प्रतिपल बढ़ तो रही हूं परन्तु एक दिन सबकुछ खत्म हो जाने के डर से अनजान, खुद के खाख हो जाने से अनजान। परन्तु मृत्यु फिर भी सुखद है, क्यूंकि तब सबकुछ ही ख़त्म हो जाना है, सबकुछ ही खाख हो जाना है, प्यार की स्थिति कहीं ज़्यादा भयावह है। शायद इसलिए कि जब कोई मरता है तो मरने वाले से जुड़े लोग उसके चले जाने का , खुद के पास न होने का दुख महसूसते हैं। प्यार में इंसान खुद के खुद से अलग हो जाने की पीड़ा खुद ही महसूसता है। इसलिए मुझे रोक लेना चाहिए खुद को लेकिन मैं सबकुछ जानते हुए भी रोक नहीं पाउंगी।
सोमवार, 12 फ़रवरी 2018
तुम्हारी ओर......
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