शनिवार, 31 मार्च 2018

तुम, मैं और प्रेम......

"तुम" तुम पर आकर अटक गयी हूँ, रुक गयी हूँ, परेशान हूँ, बेचैन हूँ। वही इंटेंसिटी, वही जुनून, वही पागलपन। प्रेम का अर्थ है मेरे लिए समर्पण और समर्पण उस हद तक जहां समर्पण और जुनून में अंतर नहीं रह जाता। और जब भी प्रेम होगा मुझे वह जुनूनी समर्पण ही होगा। प्रेम अपने चक्र पर चलेगा, आकर्षण, अति आकर्षण, लगाव, समर्पण, अवसाद, पुनर्जीवन। इस चक्र पर पुनः? किसी कोरे कागज़ पर लिखना जितना आसान होता है उससे कहीं ज़्यादा कठिन लिखे हुए कागज़ पर लिखना होगा। एक बार प्रेम चक्र से गुज़र कर वापस प्रेम मृत्यु की तैयारी? क्या सचमुच कोई तैयारी की जा सकती है? प्रेम हो रहा है। आकर्षण अब अति आकर्षण में परिवर्तित हो चुका है। लगाव प्रतिक्षण बढ़ ही रहा है। इंटेंसिटी बढ़ रही है, समर्पण के लिए अब तैयार हुँ।
परंतु क्या तुम तैयार हो समर्पण के लिए? क्या तुममें ताकत है? मुझ तक पहुंचने का रास्ता जानते हो? मुझे जानते हो?

मैं ज़हर हूँ, दवा हूँ अगर तो काला, कड़वा, काढ़ा हूँ। नसों में बिधकर दर्द से दर्द को काटने वाली दवा। मैं उम्र भर दुखूंगी। अपनी आख़िरी सांस तक टीसती रहूंगी मुझसे प्यार करने वालों को। सालती रहूंगी, चुभती रहूंगी। तुम्हे पूर्ण तैयारी से आना होगा खुद को होम करने। मुझे प्यार करने का साहस बटोरना होगा, अपनी सारी शक्ति बटोर कर दर्द सहने की क्षमता विकसित करनी होगी। मेरे अंदर, मेरे बाहर सब तरफ सिर्फ दर्द है, इसे अपनाए बिना तुम मुझ तक नहीं पहुँच पाओगे।

प्रेम के हिस्से सिर्फ खुशी के पल, हँसना, खुशी महसूसना नहीं होता। प्रेम में अवसाद का भी बराबर का हिस्सा होता है, टीस भी आवश्यक होती है। एक दूसरे को प्रेमानुभूति कराने के साथ ही एक दूसरे को रुलाने की कला का आना भी ज़रूरी है, जो सिर्फ़ खुशी की ही बातें करते हैं, वे झूठे होते हैं या अनजान होते हैं, उन्हें भान नहीं होता प्रेम के पूर्ण रूप का। तो यदि तुममें ताकत है मुझ तक पहुंचने की और यदि तुम समझते हो प्रेम के पूर्ण रूप को, तो जब मैं कहूँ मुझे प्रेम है तुमसे तो उसका उत्तर "मुझे भी " दे सकते हो तुम।

कल्पना और यथार्थ के बीच

तुम्हारे इंतज़ार में मंडी हाउस की सड़कों पर घंटो घूमती रहती हूं, ये जानते हुए कि मैं कहाँ हूँ, इसका तुम्हें तो अंदाज़ा भी नहीं है या शायद है, केवल अंदाज़ा। और इस कल्पना में कि शायद इस अंदाज़े से तुम कभी मुझे ढूंढते हुए यहाँ तक आ जाओगे, आ जाओगे अचानक मेरे बगल तक और कंधे पर हाथ रखकर चौंका दोगे मुझे। फिर हम एक दूसरे का हाथ पकड़े घंटो घूमते रहेंगे इन्हीं सड़कों पर साथ-साथ। यह कल्पना है मेरी, एक बहुत सुंदर कल्पना। जब तक कल्पना है, अंतहीन है, सुखद है, कि जब यथार्थ हो जाएगा क्षणिक हो जाएगा। कुछ समय तक वर्तमान होकर अतीत हो जाएगा। मगर जब तक कल्पना है मैं इसे जीती जाऊंगी, प्रतिक्षण, सतत इसके यथार्थ होने तक या अगर यथार्थ न हुआ तो अनंत तक। क्या मैं सचमुच इसे यथार्थ होते देखना चाहती हूँ? क्या मैं सचमुच इसे खो देना चाहती हूँ? कहते हैं कि  सुख बहुत छोटा होता है, आता नहीं कि चला जाता है। क्षणिक होता है न सुख? पर क्या इस एक क्षण की कल्पना बहुत लंबी हो सकती है? कल्पना में भी तो सुख होता है या सुखी होने का भृम? लम्बा भृम। क्या तुम उस दिन सचमुच मुझसे मिलने आये थे या वो मेरी कल्पना थी? पूरी रात तुम्हारे साथ तुम्हारी बाहों में। यह सच है या कल्पना? तुम सचमुच हो या मेरी कल्पना हो? तुम एक सुंदर कल्पना हो जिसे मैं जी रही हूँ लगातार जाने कब से और जाने कब तक जियूंगी? "कब तक जियूंगी" क्या कोई समय निर्धारित किया जा सकता है? यह सब जो मैं जी रही हूँ सच है या कल्पना या मेरा पागलपन? क्या मैं पागल हो रही हूँ या मैं पुनः प्रेम में पड़ रही हूं?
आह!! मुझे पता था कि जब मैं प्रेम में पड़ूँगी, पागल हो जाऊंगी, क्या हो रहा है ये सब? मैं लिखने में भी खुद को असमर्थ पा रही हूँ, उफ़्फ़

गुरुवार, 29 मार्च 2018

तुम

सोती रहती हूँ, मगर दिमाग का एक भाग सक्रिय रहता है। वह भाग जिसमें तुम रहते हो, वह भाग जागता है और सोने नहीं देता। बार-बार नींद उचट जाती है। उठ के बैठ जाती हूँ कई बार नींद में। दिन रात चौबीसों घंटे तुम दिमाग के एक हिस्से में हो। तुम्हारे साथ बिताए वक़्त की रील हमेशा चलती रहती है, मैं उस समय से बाहर नहीं आ पाती। जब सोचते सोचते अचानक ही याद आता है यथार्थ, तब अचंभित हो उठती हूँ, परेशान हो जाती हूँ, चाहती हूं ये रील बन्द हो जाये थोड़े समय के लिए, परन्तु ऐसा होता नहीं है। सिनेमाई प्रेम में हमेशा ही दिल का महत्व देखा है, दिल ही मुख्य बिंदु रहता है हमेशा, परन्तु प्रेम के सिनेमा में दिमाग से परेशान हूँ। इसका सम्बन्ध मेरी समझ से परे है परंतु सच यही है कि तुम दिमाग के एक हिस्से में घर कर गए हो जहाँ हमेशा ही तुम्हारे साथ दिखती रहती हूँ मैं, वे दृश्य हमेशा ही चल रहे होते हैं जब मैं तुम्हारे साथ बैठी थी कभी और तुम्हारा हाथ पकड़ा था और वो जब बातों -बातों में तुमने मेरा हाथ थोड़ा सा दबा दिया था, कुछ अलग सा महसूस हुआ था मुझे, और जितनी बार वो याद आता है कुछ अलग महसूसती हूँ, एक गहरी मुस्कान आ जाती है चेहरे पर, यदा-कदा हँसने ही लगती हूँ, चाहे एकदम अकेले हूँ या फिर भीड़ में भी, दफ़्तर में काम करते हुए या घर पर खाना बनाते हुए भी, और जिस जगह पे भी होती हूँ जिस भी दैनिक कार्य से गुज़र रही होती हूँ, तुमसे जुड़ी कोई न कोई बात उस घटना में होती है, एक रील हर घटना के लिए है।
उफ़्फ़!! क्या हुआ है दिमाग में? क्या रोल है इसमें दिल का? क्या  हो गया है मुझे?