चाँद लड़की इश्क़ मौसम खोजती थी। कुछ ओसभीनी, नशीली रातों में। और ढूंढते, ढूंढते वो मौसम के पार चली आती, तब याद आते उसे सब, वो जादू जैसा मौसम, जिसमें सफेद चादर तले मोती चमकते थे, जुगनू उड़ते थे। मोती और जुगनू की मिली जुली चमक से उसकी आंखें चुंधिया जाती थीं। वो इश्क़ खोजती थी और दर्द बटोरती जाती थी। सर्दियों के मोतियों को अपनी आंखों में करीने से सजा लिया था उसने, कि जब भी इश्क़ मौसम याद आता बस आंखों से मोती झरने लगते थे।
"सुख" मोतियों के झरने में, मौसम के खोजने में, हर तरफ सुख था, जो दुख के मैले कंबल में लिपटा हुआ था। दुःख का कंबल बहुत मोटा था, मगर सुख को बचाये रखने के लिए यह मोटाई ज़रूरी थी।
सोमवार, 21 मई 2018
चाँद लड़की , इश्क़ मौसम
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