और फिर? फिर तुम्हें मरना होगा। उनके लिए, उनके समाज के लिए, उनके रिवाजों के लिए। हाँ!! ज़रूरी है मरना। मरना शरीर का नहीं, जिसमे अंग काम करना बंद कर देते हैं। मरना, जिसमें आत्मा छलनी होती जाती है, वो मरना एक बार का नहीं होता, बार-बार मरना होता है। कई बार, जब- जब तुम्हें किसी से प्रेम होगा, उसे साबित करने के लिए मरना होगा। महत्व प्रेम करने का नहीं है, साबित करने का है। तरीका एक ही है, मृत्यु। छलनी कर दो आत्मा को अपनी, प्रेम यही बलिदान मांगता है। यदि शरीर को खत्म किया तो प्रेम में असफल हो तुम, तुम्हें आत्मा को छलनी करना होगा, प्रेम को अपने रक्त की अंतिम बूंद तक से सींचना होगा। अपने मांस से प्रेम की क्षुधा शांत करनी होगी। प्रेम करना आसान है, वो तो प्रकृति है जीव की। पर यदि तुम मनुष्य हो तो साबित करना होगा तुम्हे अपने प्रेम को। कितना? हाँ!! कितना प्रेम करते हो का उत्तर देना होगा। उतना ही गहरा अपनी आत्मा को खोदना होगा तुम्हें। यदि जन्म से ही प्रेम कर रहे हो तो उस गहराई तक जाकर खोदना होगा, पेट में नौ माह रखा गया है तुम्हें, मत भूलना और गहरा, और गहरा, और गहरा खोदना होगा। इतना गहरा कि शरीर रूपी पर्दे के पार से भी घाव दिखाई दे। और तुम्हारी छिली हुई आत्मा पर यदा कदा उठने वाली आंधी से धूल मिट्टी पड़ती रहे, और टीस उठती रहे और प्रेम साबित होता रहे।
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