शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

तुम


वो आख़िरी मुलाकात थी हमारी। उसने मुझे गले लगाने से इन्कार कर दिया था और बस मुस्कुरा कर चला गया।
मैं उसे दूर तक जाता देखती रही, उसकी जल्द वापसी की उम्मीद के साथ....... दूर जाते- जाते वो दिखना बंद हो गया।
उसका दिखना जितना धुंधला होता जा रहा था, यादें उतनी गाढ़ी हो रही थीं। मैं लिखने लगी, कुछ कविता जैसा........ पहली ही बार लिखा था मैंने........पहली ही बार कुछ चुभा था दिल में......

फिर, बहुत- बहुत दिन बीत जाने के बाद एक दिन अचानक उसका फ़ोन आया,
-कौन? मैंने जानकर अनजान बनने का नाकाम नाटक किया।

-तुम्हारे घर के नीचे खड़ा हूँ, उसने कहा।

-मैंने घर बदल दिया है

-तो अपने पुराने पते पर आ जाओ जल्दी, कहकर उसने फ़ोन काट दिया.......

  मैं भागी- भागी वहां पहुंच गई......

वो ठीक उसी जगह खड़ा था, जहाँ हमने पहली बार एक दूसरे का हाथ पकड़ा था।
उसने बाहें फैलाईं और मैं दौड़कर उससे लिपट गयी।
मैं घण्टो उसके गले लगी रही और सारी व्यथाएँ आंखों से झरती रहीं।

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