गुरुवार, 30 अगस्त 2018

अभिव्यक्ति

तुम्हारा मिलना, जैसे स्याह रात बारिश के बाद धूप खिलना।

गर्म हथेलियाँ तुम्हारी धीरे से पकड़ना और रख देना कांधे पे सर, जैसे गर्माहट का सब गीले को सहलाना।

हाथ थामे बैठना, मुस्कुराना बेवजह, अंतर तक तुम्हारे शब्द महसूसना, जैसे किरणों से नदी के पानी का सुनहला होना।

समय का बीतते जाना, सांसो का घुलते जाना, ज़िद मेरी तुम्हें थोड़ी और देर रोकना, जैसे तूफान के बाद पक्षियों का कोटर से बाहर आना।

पिछली से अबकी मुलाकात के बीच का सब कहना बताना, जैसे धुले हुए पत्तों का चमकना।

तुम्हें देखना, बस देखते जाना, और अगली मुलाकात के लिए पूछना, जैसे छुटपुट बादलों का आकाश में नज़र आना।

बीते वक़्त को याद करना, तुम्हारी यादों में सुख महसूसना, जैसे बारिश का हर छोटे बड़े गड्ढे को भर देना।

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