साल 2017 की आख़िरी सुबह, ठिठुरती सी, कोहरे में जकड़ी हुई जैसे सबकुछ दबोचे हुए है सब समेट लेना चाहती है। किसी भी समय का अंत उस समय के जीने वाले के लिए दर्दनाक होता है।शायद सुबह, आज की सुबह, 2017, 1 जनवरी से लेकर 31 दिसंबर तक इस सुबह ने इस समय को जिया है इसलिए आज इतना गहन कोहरा है,वो इस समय को जाने नही देना चाहती, इसमें ही रह जाना चाहती है,कल के खूबसूरत होने का अभी उसे कोई अंदाज़ा नहीं और न ही कोई मतलब है। हम जब भी एक समय या एक परिस्थित में होते हैं तो उसे छोड़कर अगले काल मे प्रवेश करना हमेशा ही तकलीफ दायक होता है। भले हमें पता है कि कुछ ही समय में ये सबकुछ ख़तम होकर हम एक नई परिस्थिति में होंगे और इस परिस्थिति में जो तकलीफ थी उससे भी बाहर होंगे लेकिन फिर भी हम भाग जाना चाहते हैं, अंत से, दर्द से। पर भाग कर जाया कहाँ जाय ये तो पता ही नहीं? मुझे ये सुबह दर्द में डूबी हुई लग रही है जी रही है इस अंत को पूरी शिद्दत से, सबकुछ जम सा गया है। आह! कितना सुखद होता है दर्द में खुद को डुबो देना, उसमें जीना, उसकी गहराई में उतरते जाना। उस गहराई में उतरते जाने के साथ ही खुशी का मूल्य कुछ कम सा होते जाता है, दर्द एक नशा है जो पहले तो गले नहीं उतरता लेकिन एक बार नसों तक पहुचने के बाद वो मज़ा देता है कि उससे कोई बाहर नहीं आना चाहता। ये सुबह भी अपने दर्द में डूबती जा रही है, गहराई में उतरते उतरते एक समय ऐसा आएगा जब अंधेरा हो जाएगा वो रात होना नहीं होगा वो गहराई में उतरना होगा और फिर एक वो समय आएगा जहां प्रकाश पुनः आ जायेगा सब उजाले तक पहुंच जाएगा और हम उसे नई सुबह कहेंगे, 2018 की पहली सुबह
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